टीपू का ग्रीष्म महल — सागौन का एक घर

टीपू का ग्रीष्म महल — सागौन का एक घर
Multilingual AI audio guide exhibit on WOUDiO (PWA). WOUDiO pioneered the world’s first audio guide platform with built-in donation: listeners can support the cultural venue without leaving the listening experience. The text below is the localized description, details, and narration script for this audio guide stop.
सागौन उम्र के साथ गहराता जाता है। ताज़ा कटा हो तो उसका रंग हल्के शहद जैसा होता है; दो सदियों में वह गाढ़ी चाय की ओर ढल जाता है, और हर नक़्क़ाशीदार किनारे पर उसके रेशे ऐसे उभर आते हैं जैसे सूखी नदी की तली पर छूटी लकीरें। जिस पठार पर सूखे मौसम की धूप कड़ी पड़ती है, वहाँ सागौन का घर अपनी ठंडक उस तरह सहेजे रखता है जैसे पत्थर कभी पूरी तरह नहीं कर पाता। हैदर अली, वह सिपाही जिसने ख़ुद को मैसूर का मालिक बना लिया था, यह बात समझते थे। 1781 में उन्होंने बेंगलुरु के पुराने क़िलेबंद क़स्बे के भीतर, वेंकटरमण मंदिर के बग़ल में, कलासिपाल्या की गलियों के पास, लकड़ी का एक महल शुरू करवाया। उसे पूरा होते वे नहीं देख पाए। उनके बेटे टीपू सुल्तान ने काम आगे बढ़ाया, और उन्होंने इसे जो नाम दिए, वे साफ़ बताते हैं कि वे किसी इमारत से क्या चाहते थे। ख़ुशियों का ठिकाना। रश्क-ए-जन्नत, यानी वह घर जिस पर जन्नत को भी रश्क हो। मेहराबें हिंद-इस्लामी अंदाज़ की हैं, नुकीली और इत्मीनान भरी। छज्जे ऊपरी मंज़िल को उस हर हवा के लिए खोल देते हैं जो पठार पर से गुज़रती है। खंभे तराशी हुई लकड़ी के हैं, इतनी बारीकी से तराशे गए कि ख़ुद रेशे मुड़ते-से लगते हैं। महल 1791 में पूरा हुआ। उसी साल लॉर्ड कॉर्नवालिस की फ़ौज उस क़िले में घुस आई जिसकी पनाह में यह खड़ा था। टीपू अपनी जन्नत को ज़्यादा दिन नहीं रख सके। 1799 में उनकी मौत के बाद सागौन की मेहराबों के नीचे नए लोग आए, और वे आराम करने नहीं आए थे। जन्नत का रश्क एक दफ़्तर बन गया! अंग्रेज़ों ने सुल्तान के गर्मियों वाले कमरों में अपना सचिवालय जमा लिया, और लगभग सत्तर साल तक एक नई ताक़त की फ़ाइलें इन फ़र्शों पर चलती रहीं: स्याही, बही-खाते, और लकड़ी पर घिसटती कुर्सियों की आवाज़। 1868 में जाकर, जब कमरे तंग पड़ने लगे, फ़ाइलें गाड़ियों में लादकर कब्बन पार्क के किनारे की एक नई लाल इमारत में ले जाई गईं। आज भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण इस घर की देखभाल करता है। भूतल पर एक छोटा संग्रहालय टीपू के शासन की कहानी कहता है, और उसकी चीज़ों में टीपू के शेर की एक प्रतिकृति भी है। सागौन एक के बाद एक सूखे मौसम में गहराता चला जाता है। कुछ सौ क़दम उत्तर में, हैदर अली के बनवाए क़िले का पत्थर आज भी मार्च 1791 की उस रात का निशान लिए खड़ा है, और रास्ता अब उसी ओर मुड़ता है। स्थान: टीपू सुल्तान का ग्रीष्म महल, कलासिपाल्या के पास पुराना क़िला क्षेत्र, वेंकटरमण मंदिर के बग़ल में निर्माण: 1781 में हैदर अली ने शुरू किया; 1791 में टीपू सुल्तान के शासन में पूरा हुआ मुख्य तथ्य: अधिकांशतः सागौन की लकड़ी, हिंद-इस्लामी शैली; "रश्क-ए-जन्नत" (जन्नत का रश्क) कहलाता था; 1868 तक अंग्रेज़ों का सचिवालय; भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संरक्षित, टीपू के शासन पर संग्रहालय सहित नक़्शा: बेंगलुरु का नक़्शा आधिकारिक साइट: Karnataka Tourism Photo: युकेश at hi.wikipedia / Wikimedia Commons (PUBLIC-DOMAIN)

https://woud.io/bengaluru/hi/6