Multilingual AI audio guide exhibit on WOUDiO (PWA). WOUDiO pioneered the world’s first audio guide platform with built-in donation: listeners can support the cultural venue without leaving the listening experience. The text below is the localized description, details, and narration script for this audio guide stop.
शहर के उत्तर में बसों के बोर्डों पर एक स्टॉप आज भी पुराना नाम लिए है: टाटा इंस्टीट्यूट। कंडक्टर उसे पुकारते हैं, ऑटो वाले उसे दोहराते हैं, जबकि एक दूसरा नाम क़ानून में लिखे जाने को सौ साल से ज़्यादा हो चुके हैं। ये शब्द घिसकर चिकने हो गए हैं, जैसे कोई देहरी जिसे अनगिनत क़दमों ने लाँघा हो।
उस नाम के पीछे का ख़याल समंदर पर शुरू हुआ। 1893 में जमशेदजी टाटा जापान से घर लौट रहे थे, और उसी जहाज़ पर एक युवा संन्यासी थे, स्वामी विवेकानंद। डेक पर दोनों के बीच क्या बात हुई, यह शब्द-शब्द दर्ज नहीं है, पर पाँच साल बाद टाटा ने संन्यासी को एक योजना के बारे में लिखा, जिसे उन्होंने भारत के लिए विज्ञान का एक शोध संस्थान कहा। 1898 के आख़िरी दिन यह प्रस्ताव वायसराय लॉर्ड कर्ज़न तक पहुँचा।
फिर योजना चिट्ठियों और कमेटियों में अटक गई। जमशेदजी 1904 में चल बसे, एक भी ईंट रखी जाती देखे बिना। ख़याल को उस आदमी के बिना अपना सफ़र जारी रखना पड़ा जो उसे सबसे पहले लेकर चला था।
आख़िर वह इस ऊँचे, सूखे पठार पर आकर ठहरा, जहाँ गर्मी के महीनों में भी शामें ठंडी हो जाती हैं। मैसूर के महाराजा कृष्णराज वाडियार चतुर्थ ने लगभग तीन सौ सत्तर एकड़ ज़मीन दी। टाटा परिवार ने पैसा और इमारतें दीं। मई 1909 में संस्थान की स्थापना के आदेश पर दस्तख़त हुए, और दो साल बाद पहले विद्यार्थी आए।
पहले निदेशक एक समंदर पार करके इस पठार तक पहुँचे थे: ब्रिटेन के मॉरिस ट्रैवर्स, एक रसायनशास्त्री जिन्होंने नियॉन, क्रिप्टॉन और ज़ेनॉन की खोज में हाथ बँटाया था, ऐसी गैसें जिन्हें न आँख देख सकती है, न नाक सूँघ सकती है। फिर आई मुख्य इमारत, मीनार वाला पत्थर का एक लंबा अग्रभाग, जिसके गलियारे जल्द ही क़दमों की आहट और चॉक की सूखी खटखट से गूँजने लगे।
फिर 1933 में निदेशक की कुर्सी सी. वी. रमन को मिली। तीन साल पहले उन्हें भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिल चुका था। जिस संस्थान का सपना एक हिंदुस्तानी ने समंदर पर एक जहाज़ में देखा था, उसकी बागडोर आख़िरकार एक हिंदुस्तानी वैज्ञानिक के हाथ में थी!
उनके बाद उपमहाद्वीप के हर कोने से रसायनशास्त्री, भौतिकशास्त्री और इंजीनियर आए, हर कोई अपने साथ अपनी बोली, अपना शहर और एक नोटबुक लेकर इस पठार पर चढ़ा। दशक दर दशक, प्रयोगशाला और लेक्चर हॉल के बीच उनकी रोज़ की आवाजाही ने कैंपस की पगडंडियों को ज़मीन में गहरा कर दिया।
ये पगडंडियाँ कैंपस के गेट पर ख़त्म नहीं होतीं। उनसे निकले हुनरमंद हाथ और बेचैन दिमाग़ पूरे शहर में फैल गए, उसके पूरबी छोर पर उठते रनवे और कारख़ानों की ओर।
स्थान: भारतीय विज्ञान संस्थान (स्थानीय तौर पर "टाटा इंस्टीट्यूट"), उत्तरी बेंगलुरु
स्थापना: स्थापना आदेश पर 27 मई 1909 को हस्ताक्षर; पहले विद्यार्थी 24 जुलाई 1911
मुख्य तथ्य: जमशेदजी टाटा का प्रस्ताव (1898); लगभग 371 एकड़ ज़मीन महाराजा कृष्णराज वाडियार चतुर्थ ने दान की; पहले निदेशक मॉरिस ट्रैवर्स; सी. वी. रमन पहले भारतीय निदेशक (1933–1937)
नक़्शा:
बेंगलुरु का नक़्शा
आधिकारिक साइट:
Karnataka Tourism
Photo: Ankon Roy /
Unsplash (unsplash)